Thursday, 31 March 2016

कुमार गीत

गांव छोडब नहीं.. जंगल छोडब नहीं..
माय माटी छोडब नहीं.. लडाई छोडब नहीं।।धृ।।

बांध बनाये, गांव डूबोये, कारखाना बनाये,
जंगल काटें, खदान फोड़े, सेंचुरी बनाये
जल जंगल जमीन छोड़ी हमिन कहाँ कहाँ जायें
विकास के भगवान् बता हम, कैसें जान बचाएं
हां भाई कैसें जान बचाएं।।।।

जमुना सुखी, नर्मदा सुखी, सुखी सुवर्णरेखा,
गंगा बनी गंदी नाली, कृष्णा काली रेखा
तुम पियोगे पेप्सी कोला बिस्लरी का पानी
हम कैसे अपना प्यास बुझाये पीकर कचरा पानी
हां भाई पीकर कचरा पानी।।।।

पुरखे थे क्या मुरख जो ये जंगल को बचाएं
धरती राखी हरी भरी, नदी मधु बहाए
तेरी हवस में जल गयी धरती, लुट गयी हरियाली
मछली मर गयी, पंछी उड़ गए जाने किस दिशाएं
हां भाई जाने किस दिशाएं ।।।।

मंत्री बने कंपनी के दलाल हम से जमीन छिनी
उनको बचाने लेकर आये साथमे पलटनी
अफसर बने है राजा ठीकेदार बने धनि
गाँव हमारे बन गयी है इनकी कलोनी
हां भाई इनकी कलोनी।।।।

बिरसा पुकारे एकजुट होवो छोडो ये ख़ामोशी
मछावारे आवो, दलित आवो, आवो आदिवासी
खेत खलिहान से जागो नगाड़ा बजाओ
लड़ाई छोड़ी चारा नहीं सुनो देशवासी
हां भाई सुनो देशवासी।।।।

हे कुमार गीत बघण्यासाठी खालील विडीयो बघा




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